बांकीपूर और दतिया उपचुनाव से ईव्हीएम की विश्वसनियता पर मुहर लगाने का प्रयास

कई राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि जहां पर विपक्षी दलों के चुनावी मैनेजमेंट की सोच समाप्त होती है,वहां से मोदी शाह के चुनावी मैनेजमेंट टीम की सोच शुरू होती है। जेन जी के जंतर मंतर के आन्दोलन के दौरान, ईव्हीएम की विश्वसनियता पर भी कई लोगों और सामाजिक संगठनों द्वारा सवाल खड़े किये गये थे। लोग ऐसा मानने लगे थे कि मोदी सरकार के अहंकार के पीछे,कहीं न कहीं ईव्हीएम एक बड़ा कारण हो सकता है। बीजेपी बिहार के बांकीपूर विधानसभा सीट और मध्यप्रदेश के दतिया विधानसभा सीट को भले हार गई हो,मगर कई राजनीतिक विश्लेषक इस हार को भी,बीजेपी की एक बड़ी राजनीतिक जीत बता रहे हैं। बांकीपूर सीट से जनसुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर को लगभग 20,000 वोटों के अंतर से जीत हासिल हुई है,वहीं दतिया सीट पर कांगेस के उम्मीदवार के हाथों ,बीजेपी के उम्मीदवार को एक बड़ी हार का सामना करना पड़ा है। प्रशांत किशोर ने बांकीपूर से नीरज सिन्हा को हराया तो दतिया में कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह के हाथों बीजेपी के आशुतोष तिवारी की हार हुई।हालांकि इन दोनों जीत के पीछे कुछ तथ्यात्मक कारण भी रहे हैं,इस उपचुनाव के पहले जेन जी का बीजेपी के विरोध में एक बड़ा आन्दोलन,प्रशांत किशोर जैसे शक्तिशाली उम्मीदवार के सामने नीरज सिन्हा जैसे कमजोर उम्मीदवार को पेश किया जाना और दतिया में बीजेपी के बेहद ही शक्तिशाली उम्मीदवार और पूर्व गृहमंत्री नरोतम मिश्रा का टिकट काटा जाना,यह कुछ ऐसे कारण हैं जिससे इस जीत को सामान्य ठहराया जा सकता है। मगर इन दोनों हार से बीजेपी को जो सबसे बड़ी सफलता हाथ लगी है, वह है ईव्हीएम की विश्वसनियता को फिर से कायम कर पाना। हालांकि बीजेपी ने गुजरात के उपचुनाव को आसानी से जीतकर यह संकेत भी दे दिया कि वह गुजरात के अगले साल होनेवाले चुनाव के लिए,अभी भी अपनी ताकत को बरकरार रखे हुए है। गुजरात में बीजेपी पिछले 30 सालों से सता पर विराजमान है, फिर भी उसके खिलाफ विरोधी दल, अभी तक कोई भी एन्टी इनकम्बेंसी का माहौल पैदा कर पाने में सफल नही हो पाये हैं।राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो जेन जी आन्दोलन के बाद, अंदरखाने ईव्हीएम के खिलाफ भी एक माहौल पैदा करने की कोशिश शुरू की गई थी और कुछ लोग इसके लिए कानूनी पहलूओं का भी अध्ययन करने में जुटे थे। मगर बांकीपूर और दतिया विधानसभा के उपचुनाव में हार के बाद,बीजेपी प्रवक्ता जानबूझकर बड़े चैनलों में ईव्हीएम को लेकर यह सवाल खड़े करने में लगे हैं कि इन दोनों जीत पर कोई ईव्हीएम पर सवाल खड़े क्यों नही कर रहा? मतलब साफ है कि बीजेपी इन दोनों उपचुनावों की हार के जरिए ईव्हीएम की विश्वसनियता को मजबूत करने में लगी है।



