
ठाकरे बंधुओं को अगर हिन्दीभाषी लोग या नेता पसंद नही आते हैं,तो इसके पीछे भाषा विवाद से ज्यादा हिन्दीभाषी नेताओं की गद्दारी जिम्मेदार है। पिछले दो दशकों में, ठाकरे परिवार के द्वारा कई हिन्दीभाषी नेताओं को शिवसेना में न केवल उचित प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया बल्कि लोकसभा,विधानसभा और राज्यसभा की उम्मीदवारी भी प्रदान की गई। संजय निरूपम और प्रियंका चतुर्वेदी जैसे लोगों को राज्यसभा से सांसद तक बनाया गया। आनंद दूबे को शिवसेना यूबीटी का राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया गया। मगर इन तीनों लोगों ने शिवसेना की पीठ में खंजर घोंपने का कार्य किया।संजय निरूपम ने 10 साल तक राज्यसभा का सांसद रहने के बाद शिवसेना को अलविदा कह कांग्रेस का दामन थाम लिया तो प्रियंका चतुर्वेदी ने राज्यसभा सांसद का कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही, बीजेपी के रंग में रंगती दिखाई देने लगीं थीं। अब बारी आई राष्ट्रीय प्रवक्ता आनंद दूबे की,तो पिछले कई महीनों से महाशय अपनी ही पार्टी का चैनलों के डिबेट शो में मजाक उड़ाने लगे थे और कुछ दिन पहले उन्होंने खुले तौर पर उद्धव ठाकरे के खिलाफ अपनी नाराजगी जताई थी। अब शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने उन्हे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ठाकरे परिवार से गद्दारी करनेवालों में वैसे तो अनेक मराठी नाम भी शामिल हैं,मगर ठाकरे परिवार के लिए सबसे ज्यादा दुखदायी बात यह है कि उन्होंने जिन हिन्दीभाषियों को अपने मूल सिद्धांत से हटकर,मराठी माणुस की तरह ही प्यार और महत्व दिया, वह भी गद्दार निकल गये और उन्होंने इस बात पर भी विचार नही किया कि जब कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियों ने महत्व नही दिया था,तब शिवसेना ने उनके नाम को बड़ा करने का कार्य किया।



