
दिल्ली में आन्दोलन के लिए चिन्हित किये गये जगह, जंतर मंतर पर धारा 163 लागु कर दिल्ली पुलिस और देश के कई अन्य राज्यों के पुलिस द्वारा,जिस तरीके से सीजेपी के आन्दोलन को कुचलने के लिए असंवैधानिक और आपराधिक कृत्य को अपनाया गया,वह नागरिकों को संविधान द्वारा प्रदान किये गये स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के असंवैधानिक और आपराधिक कृत्यों के खिलाफ,एक तरफ जहां विपक्षी दलों द्वारा राजनीतिक आन्दोलन चलाया जा रहा है,वहीं सीजेपी ने भी ज्ञानेश कुमार के कृत्य को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए,उनके खिलाफ रण का एलान कर दिया है। इसी के तहत सीजेपी द्वारा 10 अक्टूबर से जंतर मंतर पर आन्दोलन का एलान किया गया था और इस आन्दोलन को अपना समर्थन देने,अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त सोशल मीडिया इन्फ्लूयेंसर ध्रुव राठी भी 8 अक्टूबर को जर्मनी से भारत आये हैं।मगर सीजेपी द्वारा पुकारे गये आन्दोलन को कुचलने के लिए,केन्द्र सरकार और बीजेपी शासित राज्यों की सरकारों ने, पुलिस बल के माध्यम से आन्दोलन में भाग लेने आ रहे आन्दोलनकारियों के, न केवल स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन किया बल्कि उनके साथ एक अपराधी जैसा व्यवहार भी किया। विभिन्न राज्यों से ट्रेन के जरिए, अधिकृत टिकट लेकर दिल्ली आ रहे आन्दोलनकारियों को,बीच रास्ते से ही पुलिस ने ट्रेन से उतारकर उन्हे अपनी हिरासत में ले लिया। कानून के जानकार पुलिस के इस कृत्य को असंवैधानिक और आपराधिक बता रहे हैं।वहीं दिल्ली में ध्रुव राठी सहित सीजेपी के लगभग सभी बड़े चेहरों को हिरासत में लेकर, उन्हे जंतर मंतर पर पहुंचने से रोक दिया गया। आम आन्दोलनकारियों को भी दिन भर जंतर मंतर पहुंचने से पहले ही, हिरासत में ले लिया जाता रहा। प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण,वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव,आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा,सीजेपी के अभिजीत दिपके,सौरभ दास और आशुतोष रांका सहित सभी बड़े चेहरों को पुलिस ने जंतर मंतर जाने से पहले ही हिरासत में ले लिया। आज शाम को 7 बजे तक दिल्ली में करीब 3500 लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर है।इस आन्दोलन को कुचलने के लिए पूरी दिल्ली को एक छावनी में तब्दील कर दिया गया है और इसके लिए बीएसएफ,तिब्बत सिक्यूरिटी फोर्स,आरएएफ और दिल्ली पुलिस के करीब 50 हजार जवानों को खुली छूट प्रदान कर दी गई है कि वह जैसे चाहें वैसे आन्दोलनकारियों से निपट सकते हैं। पुलिस बल ने भी इस छूट का जमकर फायदा उठाया और आन्दोलनकारियों के साथ साथ पत्रकारों पर भी अपनी दबंगता का जबरदस्त प्रदर्शन किया। पुलिस के निशाने पर सबसे ज्यादा वह स्वतंत्र पत्रकार दिखाई दिये,जिनकी रिपोर्टिंग की बदौलत धर्मेंद्र प्रधान वाले आन्दोलन में सीजेपी को जबरदस्त सफलता हासिल हुई थी।पुलिस के इस दमनकारी रवैये को, अप्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च न्यायालय का भी जबरदस्त समर्थन हासिल हुआ है क्योंकि इस आशंका को लेकर अनेक राजनीतिक और सामाजिक संगठनों द्वारा, सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया था मगर अपनी पुरानी आदतों के अनुसार ही,सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में भी कोई स्पष्ट दिशा निर्देश जारी नही किया और केवल फिल्मी डायलॉग मारकर मुकदमे को जस का तस रहने दिया। सर्वोच्च न्यायालय के इस रूख से केन्द्र सरकार और पुलिस बलों का मनोबल इतना ज्यादा बढ़ गया कि उन्होंने खुलेआम लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन किया।हालांकि सीजेपी ने यह एलान किया है कि हिरासत के बावजूद यह आन्दोलन लगातार जारी रहेगा और जैसे जैसे आन्दोलनकारी हिरासत से बाहर आयेंगे, वह जंतर मंतर पर फिर से आन्दोलन में सहभाग लेंगे। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि पुलिस और सरकार के इस दमनकारी कदम का प्रतिसाद पूरे देश में किस तरीके से उमड़ता है।



