मीडिया और जांच एजेन्सी देश को कर रही हैं गुमराह

पिछले कई दिनों से भले ही राम मंदिर चंदा चोरी कांड,कई महत्वपूर्ण मीडिया संस्थानों की सुर्खियां बना हुआ हो,मगर इन मीडिया संस्थानों पर प्रसारित की जा रही खबरें अभी भी मुख्य सच्चाई से कोसों दूर हैं। मुम्बई तपास ने देश की आस्था से जुड़े इस गंभीर अपराध की जांच,अपने स्तर पर की है और इसकी जो सच्चाई सामने आई है,उसे इस खबर के जरिए पाठकों के सामने रखा जा रहा है।सबसे पहली खोज मुम्बई तपास ने ट्रस्ट शब्द से शुरू की है। किसी भी ट्रस्ट के लिए उसका सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज,उसका ट्रस्ट डीड होता है जिसे ट्रस्ट एक्ट के अनुसार रजिस्टर्ड करना जरूरी होता है। ट्रस्ट डीड वह पेपर है जिसमें ट्रस्ट के कामकाज की रूपरेखा,पदाधिकारियों के पद और उनकी जिम्मेदारियां,भविष्य में ट्रस्ट के पदाधिकारियों के बदलाव या नये चयन की प्रक्रिया और ट्रस्ट के विसर्जन की अवस्था का उल्लेख होता है। राम मंदिर के निर्माण और उसके व्यवस्थापन के लिए जिस ट्रस्ट का निर्माण किया गया है,उसका नाम है श्री राम जन्मभूमि तिर्थ निर्माण ट्रस्ट। ऐसे में इस ट्रस्ट का ट्रस्ट डीड भी होगा,भले ही वह ट्रस्ट डीड रजिस्टर्ड न हो,मगर इसमें ट्रस्ट के कार्यों की रूपरेखा और ट्रस्ट के पदाधिकारियों के अधिकार और जिम्मेदारियों का जिक्र तो होगा। मुम्बई तपास को जो जानकारी कुछ ऑफिसियल वेबसाइट से प्राप्त हुई है,उसके मुताबिक ट्रस्ट के पदाधिकारियों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है,मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी,धार्मिक पदाधिकारी और सरकारी या प्रशासनिक पदाधिकारी।इसमें मुख्य कार्यकारी और स्थायी पदाधिकारी के संस्थापक ट्रस्टी के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के वकील के पारासरण, ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में महंत नृत्य गोपालदास,ट्रस्ट के महासचिव के रूप में चंपत राय और लेखाकार के रूप में स्वामी गोविन्द देवगिरी जी महाराज का नाम शामिल है। इसी तरीके से धार्मिक ट्रस्टी के रूप में जगतगुरू शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती, जगतगुरू माधवाचार्य स्वामी विश्व प्रसन्ना तिर्थ जी महाराज,युगपुरूष परमानंद जी महाराज,महंत दिनेन्द्र दास,डा.अनिल मिश्रा और कृष्ण मोहन का नाम शामिल है। सरकारी और प्रशासनिक ट्रस्टी के रूप में नृपेन्द्र मिश्रा,संजय प्रसाद आईएएस,उत्तर प्रदेश सरकार,प्रशांत लोखंडे आईएएस केन्द्र सरकार,शशांक त्रिपाठी आईएएस,डिस्ट्रीक मजिस्ट्रेट ऑफ अयोध्या का नाम शामिल है।अब सवाल यहां से शुरू होता है कि आखिर इस त्रिस्तरीय ट्रस्ट में किस पदाधिकारी और किस श्रेणी के ट्रस्टियों को क्या क्या भूमिका दी गई थी और उनके अधिकार क्या क्या थे? सबसे बड़ा सवाल तो उन प्रशासनिक और सरकारी ट्रस्टियों की भूमिका पर खड़ा होता है,जिन्हे राज्य और केन्द्र सरकार का प्रतिनिधी बनाया गया था। जिस ट्रस्ट में हजारों करोड़ रूपये चंदा के रूप में जमा थे,उसमें मौजूद वरिष्ठ प्रशासनिक और सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी बिल्कुल नगण्य होगी इसे कोई स्विकार नही कर सकता और अगर ऐसा हुआ होगा तो इसका मतलब साफ है कि इस ट्रस्ट का निर्माण करनेवाली केन्द्र और राज्य सरकार के मन में ही बेईमानी थी। ऐसे में या तो यह प्रशासनिक और सरकारी अधिकारी इस चंदा चोरी और ट्रस्ट के किसी भी घोटाले में सबसे ज्यादा दोषी हैं या फिर संयुक्त रूप से केद्र और उत्तर प्रदेश की सरकार।मगर देश की महत्वपूर्ण मीडिया और जांच एजेन्सियां इन सबों से परे कुछ छुटभैये कर्मचारी सहित चंपत राय और अनिल मिश्रा पर निशाना साधते नजर आ रहे हैं। मुम्बई तपास का यह मानना है कि राम मंदिर चंदा चोरी या इससे जुड़े ट्रस्ट के किसी भी घोटाले की जांच की शुरूवात उस ट्रस्ट डीड से की जानी चाहिए,जिसमें सभी पदाधिकारियों के अधिकार और जिम्मेदारियों को उल्लेखित किया गया है।



