तीन साल से मीलाॅर्ड ने लटका रखा है बेहद ही जरूरी संवैधानिक मुद्दा

आजकल लोग जो खुलकर सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना करने लगे हैं,उसका सबसे बड़ा गुनाहगार अगर कोई है तो वह स्वयं सर्वोच्च न्यायालय है। केन्द्रीय सत्ता के प्रति उसका प्रेम अप्रत्यक्ष न रहकर खुलकर सामने आ गया है।नोटबंदी,राफेल,एसआईआर,शिवसेना और राष्ट्रवादी का असंवैधानिक विभाजन,पीएम केयर फंड, इलेक्टोरल बांड,ईडी को खुली छूट,अडानी घोटाला,पर्यावरण विनाश और मणिपुर ऐसे अनेक मामले हैं जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के मीलाॅर्ड ने, खुलकर केन्द्र सरकार और उनके समर्थित राज्य सरकारों को अपना समर्थन दिया है। सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से जो तीन सबसे बड़े संवैधानिक अपराधों को अप्रत्यक्ष समर्थन प्रदान किया गया है,उसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मामला,एसआईआर और महाराष्ट्र के राजनीतिक दलों का असंवैधानिक विभाजन शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने, गवर्नर के जिस निर्णय से,महाराष्ट्र के राजनीतिक दल शिवसेना का विभाजन कर तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार को गिराया गया था,उसे असंवैधानिक घोषित कर दिया था,मगर बदली हुई सरकार को बर्खास्त नही कर,उसने अपना केन्द्रीय सत्ता प्रेम का प्रदर्शन कर दिया था। उसके बाद बारी आई असली शिवसेना और नकली शिवसेना की,तो इसकी जिम्मेदारी संविधान के अनुसार तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के कंधों पर डाल दी गई। मगर इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि विधानसभा अध्यक्ष इसपर निर्णय लेते हुए,सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले का ध्यान रखेंगे,जिसमे तत्कालीन गवर्नर के फैसले को असंवैधानिक बताया गया था। मगर राहुल नार्वेकर ने अपना फैसला अपनी मर्जी के अनुसार सुनाया और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को दरकिनार कर दिया। इसके बाद शिवसेना उद्धव गुट की तरफ से विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई,मगर इतने महत्वपूर्ण संवैधानिक मामले पर पीछले तीन साल में,सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय लेना तो छोड़िए इसपर गंभीरता से सुनवाई तक नही की। इसके बाद से ही बीजेपी की बहुमत वाली केन्द्र सरकार ने,अनेक पार्टियों को विभाजित करना शुरू कर दिया। यह एक तरह से लोकतंत्र की हत्या का सबसे बड़ा अपराध है।मगर मीलाॅर्ड को लोकतंत्र की कहां चिंता है,अब एक बार फिर मीलाॅर्ड ने शिवसेना के असंवैधानिक विभाजन वाले केस को 4 अगस्त को लिस्ट किया है, लेकिन मीलाॅर्ड अगर इसे गंभीरता से लेते तो 4 अगस्त को पूरा समय इसी मामले को देते और 4 अगस्त को ही इसपर अपना फैसला सुना देते,क्योंकी यह मामला लोकतंत्र की हत्या जैसे गंभीर संवैधानिक अपराध से जुड़ा है। खैर देखिए अब 4 अगस्त को क्या होता है,वैसे मीलाॅर्ड का मोदी शाह प्रेम तो पहले ही जग जाहिर हो चुका है,ऐसे में कोई बड़ी उम्मीद की कल्पना करना नादानी होगी।



