
न्यायिक लड़ाई के दौरान जजों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है,इसका एक बड़ा उदाहरण चुनाव आयोग द्वारा कराये जा रहे एसआईआर के मुद्दे पर भी सामने आया है। चुनाव आयोग के जिस एसआईआर को सर्वोच्च न्यायालय की एक खास बेंच ने,सैकड़ों विवादों के बावजूद लगातार हरी झंडी दिखाने का कार्य किया,उसी एसआईआर के एक विवाद पर मुम्बई उच्च न्यायालय ने, न केवल चुनाव आयोग की जमकर क्लास लगा दी बल्कि सर्वोच्च न्यायालय को भी यह आइना दिखा दिया कि लोकतंत्र में,भारत के मतदाताओं के मत का क्या संवैधानिक महत्व है।मुम्बई उच्च न्यायालय में गोवा के एसआईआर से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया था,जिसमें 6 मतदाताओं का नाम, उनके पूर्व के पते पर नही रहने के कारण मतदाता सूची से काट दिया गया। हालांकि इन सभी छः लोगों ने अपने मकान के बदले हुए पते की जानकारी फार्म 8 पर भरकर संबंधित बीएलओ को सौंप दी थी,मगर इसके बावजूद उनके नाम को मतदाता सूची में शामिल नही किया गया।फिर उन्होंने अपने अपील में सारी सच्चाई को दस्तावेजी सबूतों सहित, चुनाव आयोग के संबंधित अपीलीय अधिकारी के पास जमा कराया। संबंधित अधिकारी ने उन्हे यह बताया कि फाइनल लिस्ट में आपका नाम मतदाता सूची में आ जायेगा,मगर इसके बावजूद इन छः लोगों का नाम मतदाता सूची में नही आया। फिर इनलोगों ने मुम्बई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इस मामले की सुनवाई के दौरान, जब चुनाव आयोग की तरफ से न्यायालय को यह बताया गया कि इनके नाम को ऑनलाइन शामिल करने के लिए अपलोड किया गया था,मगर साॅफ्टवेयर ने इनके नाम को स्विकार नही किया,यह जानकारी मिलते ही मुम्बई उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग की क्लास लगा दी और पूछा कि भारत में किसी सर्वर को, निर्धारित नियमों और कानूनों से बड़ा कब बना दिया गया और मतदाताओं के भविष्य या अधिकार को आपने किसी सर्वर के भरोसे कैसे छोड़ दिया। मुम्बई उच्च न्यायालय के इस तिखे सवाल के बाद, चुनाव आयोग की तरफ से जजों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि मतदाताओं को अपना नाम नये सिरे से जोड़ने के लिए उन्हे फार्म 6 उपलब्ध करा दिया गया है,इसपर मुम्बई उच्च न्यायालय ने एक और संवैधानिक सवाल किया कि जो लोग पुराने मतदाता हैं आप उनका नाम नये मतदाता के रूप में कैसे शामिल कर सकते हैं,क्योंकी फार्म 6 तो नये मतदाताओं के लिए होता है। इसपर चुनाव आयोग के वकील खामोशी की दिशा में चले गये। फिर मुम्बई उच्च न्यायालय ने यह कहा कि किसी भी मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाने के पहले, क्या चुनाव आयोग ने उनको अपना पक्ष रखने का मौका दिया था,इसपर भी चुनाव आयोग के वकील बंगले झांकते नजर आये।फिर मुम्बई उच्च न्यायालय ने एक और गंभीर टिप्पणी की कि यह तो वह छः लोग हैं जो हमारे दरवाजे तक पहुंचने में सफल रहे हैं,पता नही आपके इस सर्वर के कारण कितने लोग ऐसी ही गंभीर परिस्थिती का सामना कर रहे होंगे। मुम्बई उच्च न्यायालय में अब इसपर आगे की सुनवाई किसी और दिन की जायेगी। मुम्बई उच्च न्यायालय के द्वारा खड़े किये गये इन सवालों को,सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को आइना दिखानेवाला माना जा रहा है,जिनके समर्थन के कारण आज पूरे भारत में,लगभग 13 करोड़ लोगों का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है।



