मुम्बई उच्च न्यायालय के सख्त आदेश से पुलिस महकमा का पारा चढ़ा

मुम्बई उच्च न्यायालय में,नवी मुम्बई पुलिस प्रशासन के खिलाफ नवी मुम्बई महानगरपालिका द्वारा दिये गये प्रतिज्ञापत्र के बाद,पुलिस प्रशासन और पालिका प्रशासन के बीच ठन गई है। नवी मुम्बई पुलिस आयुक्त ने अब किसी भी अवैध ईमारत के खिलाफ की जानेवाली तोड़क कार्रवाई के दौरान,मांगी गई पुलिस सुरक्षा को लेकर एक लंबा चौड़ा एसओपी तैयार कर दिया है। इस एसओपी में विशेष तौर पर इस बात का उल्लेख है कि अगर पुलिस सुरक्षा उपलब्थ कराने के बाद भी पालिका प्रशासन ने संबंधित ईमारत या स्ट्रक्चर पर कार्रवाई नही की तो, कार्रवाई न करने के कारण को लिखित तौर पर पुलिस प्रशासन को बताना होगा।इसके अलावे जिस ईमारत के संदर्भ में पुलिस सुरक्षा मांगी गई है, उस ईमारत को छोड़कर किसी दूसरे जगह पुलिसवालों का इस्तेमाल नही किया जायेगा। पुलिस संरक्षण निःशुल्क दिया जाये या सशुल्क,इसका निर्धारण पुलिस के वरिष्ठ पदाधिकारी करेंगे। पुलिस संरक्षण की मांग के दौरान, पालिका को अपने तोड़क वाहनों सहित इस तोड़क कार्रवाई में मौजूद सभी वाहनों की जानकारी पुलिस को देनी होगी। साथ ही उन अधिकारियों और कर्मचारियों का नाम भी पुलिस को देना होगा, जो तोड़क कार्रवाई के दौरान घटनास्थल पर मौजूद रहेंगे। तोड़क कार्रवाई के बाद उस कार्रवाई की पूरी रिपोर्ट फोटोग्राफ्स सहित पुलिस प्रशासन को देना होगा।नवी मुम्बई पुलिस आयुक्त की तरफ से इस संदर्भ में लगभग दस पेज का एक लंबा चौड़ा एसओपी तैयार किया गया है और इस एसओपी का एक उद्देश्य पालिका और सिडको प्रशासन को कानून के शिकंजे में घेरना भी दिखाई दे रहा है।दरअसल मुम्बई उच्च न्यायालय में एडवोकेट किशोर शेटटी द्वारा दायर एक न्यायालय अवमान याचिका की सुनवाई में,ऐरोली के लगभग पचास अवैध ईमारत और स्ट्रक्चर को तोड़ने का निर्देश दिया गया था। इस निर्देश पर अमल करने के दौरान,कुछ स्थानीय नेता अपने समर्थकों के साथ पालिका अधिकिरियों का विरोध करने पहुंच गये और उन्होंने पालिका अधिकारियों पर,पुलिस के सामने ही हमला कर दिया। इस दौरान पुलिस प्रशासन की तरफ से, पालिका अधिकारियों के बचाव का कोई विशेष प्रयास नही किया गया। यहां तक कि पालिका द्वारा नामजद एफआईआर दर्ज कराने के बाद भी, 15 दिनों तक पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नही की। आरोपियों के आक्रामक रवैये से घबराकर पालिका की एक गर्भवती महिला अधिकारी का गर्भपात भी हो गया। पुलिस की इसी निष्क्रियता का उल्लेख पालिका प्रशासन ने अपने प्रतिज्ञापत्र में,अगली तारीख को उच्च न्यायालय के समक्ष कर दिया,इसपर उच्च न्यायालय ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ अपनी गंभीर नाराजगी दर्शाते हुए,पिड़ीत पालिका की महिला अधिकारी को 25 लाख का मुआवजा देने का निर्देश राज्य सरकार को दिया,साथ ही संबंधित पुलिस अधिकारियों की उच्च स्तरीय जांच की बात भी न्यायालय ने की। इसी के बाद से पूरा पुलिस महकमा,पालिका प्रशासन और सिडको प्रशासन के खिलाफ हो गया है और अब उनकी तैयारी पालिका के अधिकारियों को कानूनी रूप से बांधने की चल रही है। हालांकि उच्च न्यायालय में घटित इस घटना का, एक अच्छा प्रभाव यह हुआ है कि जिन सरकारी यंत्रणाओं का अबतक भू माफियाओं के साथ सामूहिक गठबंधन था,उसमें एक गहरा दरार आ गया है,जो जल्दी मिटनेवाला नही दिखाई देता है।



