शुद्ध और सही माप की तर्क के साथ लाई गई थी योजना

नवी मुम्बई महानगरपालिका की तिजोरी को तरह तरह के तंत्र ज्ञान का हवाला देकर कैसे खाली किया जाता है,इसके अनेक उदाहरण पहले ही सामने आ चुके हैं। पानी चोरी रोकने के लिए और उसका पता लगाने के लिए स्काॅडा सिस्टम,फिर ऑटोमेटिक पानी मीटर,साईंटिफिक वेस्ट मैनेजमेन्ट और सभी महत्वपूर्ण चौराहों और तालाबों में फाउन्टेन की स्थापना, यह कुछ ऐसी योजना है जिसके तंत्रज्ञान का हवाला देकर नवी मुम्बई महानगरपिलिका पीछले कुछ वर्षों में सैकड़ों करोड़ रूपये लुटा चुकी है।अब नया मामला लिडार सर्वे का सामने आया है। नवी मुम्बई पालिका ने 9 करोड़ रूपये की लिडार सर्वे की निविदा को स्वीकृत करते हुए, यह तर्क दिया था कि इसके जरिए वह शहर के पूरे संपति का सर्वे करायेगी जो इतना शुद्ध और प्रमाणिक होगा कि इससे सभी संपतियों की सही स्थिती और उसका सही क्षेत्रफल सामने आ जायेगा। करीब दो वर्ष का समय लेकर, इस लिडार सर्वे को पूरा कर लिया गया और इस सर्वे रिपोर्ट को मान्यता देते हुए ठेकेदार को पूरे रकम की अदायगी भी कर दी गई। मगर जब इस सर्वे के आधार पर संपति कर का निर्धारण किया जाने लगा,तो हजारों की संख्या में ऐसी संपति सामने आई जिनके पुराने संपति कर और नये संपति कर में कई गुना का अंतर दिखाई देने लगा। इसके बाद पालिका प्रशासन को यह लगा कि अगर इस सर्वे के अनुसार संपति कर का निर्धारण हुआ तो उनपर हजारो करोड़ रूपये की अतिरिक्त वसूली का भार आ जायेगा। यह स्थिती भांपते ही पालिका आयुक्त कैलाश शिन्दे ने, संपति कर विभाग को फिर से मैनुअल सर्वे के आधार पर संपति कर निर्धारित करने का निर्देश दे डाला।सवाल यह उठता है कि जब लिडार सर्वे की रिपोर्ट को गटर में ही डालना था,फिर इसपर पालिका प्रशासन ने 9 करोड़ रूपये की राशि क्यों खर्च की ? सवाल यह भी उठता है कि पालिका के संपति कर विभाग पर पूर्व पालिका आयुक्त तुकाराम मुंढ़े के समय में जो सैकड़ों करोड़ के घोटाले का आरोप लगा था,क्या उसे आज भी उसी तरीके जारी रखा गया है और वर्तमान पालिका आयुक्त कैलाश शिन्दे जानबूझकर लिडार सर्वे को खारिज करने में लगे हैं ?



