नवी मुम्बई महानगरपालिका के छूटे पसीने

जब कोई जस्टिस सही मिल जाये तो प्रशासनिक अधिकारियों के पसीने कैसे छूटने लगते हैं,इसका एक उदाहरण कल मुम्बई उच्च न्यायालय में दिखाई दिया। इसके पहले जो नवी मुम्बई महानगरपालिका,मुम्बई उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आलोक आराधे के फैसलों से बेहद निश्चिन्त नजर आ रही थी,उसी नवी मुम्बई महानगरपालिका का सामना जब जस्टिस गडकरी और कमलखट्टा की बेंच से हुआ तो पालिका के वकील पसीने पसीने हो गये।
दरअसल यह दोनों ही मामला नवी मुम्बई में सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते जा रहे अवैध निर्माण कार्य से जुड़ा है। मुम्बई उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय ने,नवी मुम्बई के अवैध निर्माण कार्य से जुड़े जिन दो मामलों को बेहद गंभीरता से लेते हुए कड़े अंतरीम आदेश जारी किये थे,उन्ही मामलों को बेहद हल्का करते हुए उनके बाद के मुख्य न्यायाधीश आलोक आराधे ने एक सामान्य सा अंतीम आदेश पारित कर दिया,जिसके बाद नवी मुम्बई महानगरपालिका प्रशासन और नवी मुम्बई के भूमाफिया काफी राहत की सांस ले रहे थे। लेकिन इन्ही दो आदेशों में से एक पर अमल न किये जाने के खिलाफ याचिकाकर्ता एडवोकेट किशोर शेट्टी ने न्यायालय अवमान याचिका दाखिल की थी,जो संयोगवश मुम्बई उच्च न्यायालय के ऐसे बेंच के सामने सुनवाई के लिए चली गई,जिस बेंच को कानून का उल्लंघन करनेवाले लोगों के लिए सबसे खतरनाक बेंच माना जाता है। जस्टिस गडकरी और जस्टिस कमलखट्टा की इस बेंच ने अपनी प्रसिद्धी के अनुरूप ही इस अवमान याचिका के तथ्यों को भी बेहद गंभीरता से लेते हुए,नवी मुम्बई महानगरपालिका के वकील से कई तीखे सवाल किये। न्यायालय ने इतना तक कह दिया कि नवी मुम्बई पालिका आयुक्त इस देश के ही नागरिक हैं या विदेश के,जिन्हे यह भी नही पता कि अवैध निर्माण के मामले में मुम्बई उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने कितने कड़े कड़े निर्देश जारी किये हैं।
माननीय न्यायालय ने नवी मुम्बई में अवैध निर्माण के 20,000 के आंकड़ों को बेहद गंभीरता से लेते हुए पालिका के वकील से यह पूछा कि क्या आपका आयुक्त और संबंधित अधिकारी इस ग़भीर मुद्दे पर आंख बंदकर सोये पड़े हैं। इसके बाद न्यायालय ने राज्य सरकार के वकील से पूछा कि आप इस गंभीर मुद्दे पर क्या कहना चाहेंगे,इसपर राज्य सरकार के वकील ने कहा कि अवैध निर्माण कार्य के जरिए कुछ लोग लाखों करोड़ों की कमाई कर रहे हैं,इसलिए ऐसे लोगों के खिलाफ और ऐसे लोगों को सरकारी संरक्षण प्रदान करनेवाले अधिकारियों के खिलाफ,आपराधिक मुकदमा दर्ज कर इनसे किसी अपराधी की तरह निपटना होगा। राज्य सरकार के इस तर्क से न्यायालय भी काफी सहमत दिखाई दिया और उसने अंतीम सुनवाई के लिए गुरूवार 11 जून की तिथी निर्धारित कर दी।
याचिकाकर्ता किशोर शेट्टी ने इस सुनवाई के दौरान पालिका के एक सिनीयर वकील पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने उनके पूर्व के जनहित याचिका में,सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय को लेकर पूरी तरीके से गलत जानकारी उच्च न्यायालय को दी है,जिसके द्वारा न्यायालय को यह बताने का प्रयास किया गया था कि समाजसेवक राजीव मोहन मिश्रा द्वारा दाखिल जनहित याचिका क्रमांक 80/2013 में,जस्टिस अभय ओक की ख॔डपीठ ने 2018 में जो अंतीम आदेश पारित किया था,उसमें सर्वोच्च न्यायालय ने 2019 में डेमोलिशन की कार्रवाई पर स्थगन दे रखा है,मगर यह बात बिल्कुल सर्वोच्च न्यायालय के रिकॉर्ड से परे है। न्यायालय इस मसले पर भी गुरूवार को सुनवाई करनेवाली है।



